मातृभाषा का महत्व

 अपनी मातृभाषा के त्याग न करें !!


हमारे देश भारत में बहुत सारी भाषाओं का घर है। अगर हम अपने देश को "भाषाओं का संग्रहालय बोलें तो वह गलत नहीं होगा। जहां एक तरफ बाकी देश अपनी मातृभाषा को संरक्षित रखते हैं, और उसकी अहमियत को जानते हैं, वहीं दूसरी ओर देखा जाए तो हमने अंग्रेजी भाषा को अपने उपर हावी होने दिया है।  मानिए कि दो लोग है उनमें से एक हिन्दी में संवाद कर रहा है और दूसरा अंग्रेजी में, तो हमारी मानसिकता यही बन चुकी है कि जो हिन्दी बोलते है वह अनपढ़ और ग्रामीण प्रदेश से आया हुआ है, और जो अंग्रेजी बोलते है वह बहुत शिक्षित और आधुनिक है।

बच्चा जब जन्म लेता है तो यह प्रकृति की बहुत बड़ी देन है कि वह पहला शब्द " मां " बोलते हैं। बालक और मां के बीच होने वाले शाब्दिक संचरण मातृभाषा को जन्म देता है। 

हम अपनी संस्कृति को तभी संरक्षित रख सकते है जब हम अपनी मातृभाषा को महत्व दें। आज-कल के लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ने का प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि वो ज़माने के साथ आगे बड़ सकें।

अपनी मातृभाषा को भूलने की वजह से सौराष्ट्र समुदाय को बहुत ही तकलीफ उठानी पड़ती है। पूर्वजों अपनी मातृभूमि गुजरात को छोड़ने के मजबूर टर्की का आक्रमणकारी महमूद गजनी ने  किया था। इसलिए दक्षिण भारत में विस्थापित होना पड़ा। इसी कारण आज तक संचार काफी हद तक प्रभावित हो गया।

 हम हमारी मातृभाषा की जड़ें खोदने के बाद भी हम हमारी मातृभाषा, संस्कृति का त्याग नहीं की क्योंकि हमारे भाव यह है कि मातृभाषा, हमारी पहचान का निर्धारित करते हैं। 

यह एक निजी उदाहरण है। यह केवल एक भाषा के साथ जुड़ी हुई नहीं है, बहुत सारी क्षेत्रीय भाषा, राजभाषाएं यह समस्या से सामना करना पड़ता है। एक विश्व की अनुपम धरोहर है। हमें अपनी सभ्यता के, निष्ठा के बारे में सचेत रहना चाहिए और प्रोत्साहित करना चाहिए।

अपनी मातृभाषा सीखो!  उनकी संरक्षण करो! अपनी मातृभाषा को भूलना वैसा ही है जैसा अपनी पहचान को भूलना!

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